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Tuesday, December 8, 2020

बूझो तो जानें राष्ट्रीय स्तर ही नहीं नगर स्तर पर आपके पास भी हो सकते है ऐसे व्यक्तिव वाले व्यक्ति।

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बूझो तो जानें

राष्ट्रीय स्तर ही नहीं नगर स्तर पर आपके पास भी हो सकते है ऐसे व्यक्तिव वाले व्यक्ति ?

माना वो दुकानदार था क्या बुरा था, प्रतिस्पर्धा ने उसे कर्जदार बना दिया वो भी इतना की आत्महत्या करने जा रहा था इसमे उसका क्या कसूर ?
एक मित्र को दया आयी उसने एक समाचार पत्र की एजेंसी अपने नाम पर दिलाई तो क्या हुआ, क्या एहसान किया ?
बदले मैं उसने उस एजेंसी पर कब्जा जमा कर एहसान बदला पूरा किया इसमें उसका क्या कसूर ?
समाचार पत्र का बेनर बड़ा था, फैक्टी का मलबा तोड़ने की खबर कवरेज वो चला था, कवरेज के दौरान पिटे तो क्या हुआ, उसके समाचार पत्र ने साथ दिया था, उसने 5 लाख ही तो उस प्रकरण मैं पाया था ? उसमें उसका क्या कसूर ?
धंधा ठीक-ठाक चल निकला, दुकान का ब्याज सहित कर्ज भी चुकाया, कुछ पैसा भी बनाया, चिटफंड भी बनाई, बिल्डरों दलाली भी खाई, जुए की दुकान भी चलबाई, जुए सट्टे की कमीशन भी खाई, मकान भी लिया, दुकान भी खोलकर किराए से दी इसमें उसका क्या कसूर ?

पत्रकारिता मैं बस इतना कमा पाया कि कुछ औरों को हजम नहीं आया, एक कम्बखत पत्रकारिता मैं नया व्यक्ति घुस आया, फिर नए पट्टलकार ने पुराने पट्टलकार के चलते धंधे को पलीता क्यों लगाया, उसमें उसका क्या कसूर ?
बूझो तो जानें राष्ट्रीय स्तर ही नहीं नगर स्तर पर आपके पास भी हो सकते है ऐसे व्यक्तिव वाले व्यक्ति।


उसने नए नए पत्रकार को रोकने एड़ी चोटी का जोर लगाया, झूठे प्रकरण बनवाने से लेकर, पुलिस प्रशासन के प्रदेश स्तर तक चक्ककर लगाया, मगर फिर भी वो हाथ नहीं आया, इसमें उसका क्या कसूर ?

फिर सोचा एक छुटभय्या नेता को भड़काया उससे महिलाओं को हथियार बनाया नए पट्टलकार पर हमला कराया फिर भी उसका कुछ न बिगाड़ पाया तो उसका क्या कसूर ?

फिर उसने सोचा क्यों न नगर हित के आंदोलन कर नगर की सिमपेथी को बेचा जाए, आंदोलन दो-दो खड़े किये ब्रिज का हो या हाइवे हर जगह अपनाया पर वो भी काम नहीं आया, वहां राजनीतिकों लात मार भगाया तो उसमें उसका क्या कसूर ?

फिर उसने सोचा क्यों न धर्म का चोला पहन राजनीति मे कदम बढ़ाऊ भले ही अपनी पत्रकारिता की धौंश बात किसी वर्ग विशेष को थानों से छुड़ाऊ, उसमें उसका क्या कसूर ?

पर वहां भी एक खुद से बड़ा पाखंडी भगवा धारी चोला पहने शराब बेचते सट्टे वालों से बड़ी अड़ी लेते नजर आया वहां भी पटलकार को कुछ नही मिल पाया, उसमें उसका क्या कसूर ?

पर भगवाधारी ने पैसा उसने खूब कमाया इसमें उस बेचारे का क्या कसूर ?

अब फिर भी उसे परिवार तो चलाना था, अंजुमन की क़िस्त चढ़ाना था, गाढ़ी की क़िस्त चढ़ाना है तो वो क्या करे, इसमें उसकी क्या कसूर ?

फिर उसे एक नया आयडिया आया, एक कथित पत्रकार दलाल को हथियार बनाया, जिसने जूना इंदौर थाने दर्ज प्रकरण के बाद से नाम बदल अपना कारोबार था जमाया।
फिर उसको अपने साथ लाया उससे मिलकर अपना धंधा हनिट्रेप सहित दल्लाई का धंधा चलाया। वहां भी पड़ गयी उस नए पट्टलकार की नजर उसको भी नए कमीने ने बन्द कराया, उसमें उसका क्या कसूर ?
अब वो क्या करे आप ही बताए अब वो क्या करे ?

अब नए पट्टलकार को हनीट्रैप सहित झूठे प्रकरणों मैं फसाने के लिए नए चक्रव्यूह की तलाश मैं ?

ये लेख किसी भी व्यक्ति विशेष के लिए नहीं लिखा गया संयोगवश आपके आस पास कोई व्यक्ति ऐसा है या आप ऐसा सोचते है तो आपका अपना दृष्टिकोण हो सकता है।

संयोगवश, इस लेख मैं किसी भी व्यक्ति को अपना चरित्र नजर आये तो इसके लिए लेखक जिम्मेदार नहीं।

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