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Monday, May 17, 2021

अधिकारियों को व्हाट्सअप ग्रुपों से दूरियां बनाना उचित या अनुचित ?

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अधिकारियों को व्हाट्सअप ग्रुपों से दूरियां बनाना उचित या अनुचित ?

अधिकारियों को व्हाट्सअप ग्रुपों से दूरियां बनाना उचित या अनुचित ?
लेखक, प्रेस काउंसलिंग ऑफ इंडिया के सदस्य व वरिष्ठ पत्रकार

डिजिटल युग में पत्रकारिता करने का तरीका अथवा पत्रकारिता के मंचों की छवि पर सवालिया निसान लगता दिख रहा है। एक तरफ हर छोटी-बड़ी घटना लोगों तक जल्द से जल्द पहुंच रही है लेकिन वह कितनी विश्वसनीय है यह कोई कुछ नहीं कह सकता ? सोशल प्लेटफार्मों पर प्रसारित अनावश्यक संदेश व खबरें लोगों की परेशानी का कारण बनते दिख रहे हैं। मेरा मानना है कि उच्चाधिकारियों/अधिकारियों को व्हाट्सअप ग्रुपों से बहुत पहले ही दूरियां बना लेना चाहिये। क्योंकि अक्सर देखने को मिल रहा है कि व्हाट्सअप ग्रुपों में प्रसारित किये गये गैरजिम्मेदारा समाचारों अथवा उनसे सम्बन्धित लिंको को पढ़ कर उनके मन-मस्तिष्क पर भय दिखने लगता है और जल्दबाजी में ऐसे फैसले ले लेते हैं जो अनुचित होते हैं। कई निर्दोष व्यक्तियों के खिलाफ कार्यवाई हो जाती है, तो कई दोषी बच जाते हैं अथवा कई अधीनस्थ कर्मचारी अनावश्यक ही बलि का बकरा बन जाते हैं।
कई मामले ऐसे देखने को मिले कि व्हाट्सअप ग्रुपों एवं सोशल प्लेटफाॅर्मो में खबरें चलाईं गई और जब देखा कि जल्दबाजी में गैरजिम्मेदारी वाला कृत्य हो गया तो उसे नष्ट (डिलीट) कर देते हैं। यह भी देखने को मिल रहा है कि अनेकों लोग एक ही खबर को ग्रुपों में डाल देते हैं और उसके बारे में यह जानकारी जुटाना मुश्किल भरा होता है कि यह पोस्ट/संदेश/खबर किसने डाली और उसे किसने-किसने अग्रसारित/फारवर्ड किया है। अधिकारियों को चाहिये कि पुष्टिकारक, जिम्मेदार व विश्वसनीय मंचों पर ही भरोसा करें, क्योंकि अगर वो कुछ अनुचित अथवा गैर जिम्मेदारी वाली खबरें चलायेंगे तो उन्हें आसानी से चिन्हित किया जा सकता है और कानून के दायरे में उनपर कार्यवाही की जा सकती है।
इन दिनों देखने को मिल रहा है कि रौब अथवा भोकाल जमाने के चक्कर में विशेषकर युवा वर्ग अपने को प्रेस अथवा मीडिया से जोड़कर अपने को पत्रकार दिखाना चाहता है जबकि ज्यादातर उन कथित पत्रकारों को काॅपी-पेस्ट-फारवर्डिग के अलावा कुछ नहीं आता लेकिन अपने को कहलाते हैं वरिष्ठ पत्रकार। ऐसे पत्रकारों के खिलाफ कुछ ठोस नीति बनाने की आवश्यकता है जो पत्रकारिता को बदनाम कर रहे हैं और प्रेस कार्ड सिर्फ भोकाल दिखाने के लिये ही बनवाते हैं। लाॅक डाउन के दौरान प्रेस कार्ड बनाने वालों का धंधा कुछ ज्यादा ही चमक उठा क्योंकि लोग इसी लिये कार्ड बनवा रहे हैं कि पुलिस उन्हें ना रोके। अक्सर देखने को भी मिल रहा है कि अपने वाहनों में प्रेस का स्टीकर लगा घूमा करते हैं और पुलिस वाले इस लिये उसे नहीं छेड़ते कि पता नहीं कैसा पत्रकार है ?
ऐसे में एक तो पत्रकारिता की छवि पर बट्टा लग रहा है तो दूसरी ओर दबाव के चलते कई बार निर्दोष व्यक्ति बलि का बकरा बन रहा है अथवा दोषी व्यक्ति बच जाता है। मीडिया संस्थानों को इस ओर ध्यान देना चाहिये कि वो ऐसे लोगों के प्रेस कार्ड ना बनायें जो सिर्फ भोकाल अथवा रौब जमाने के लिये ही पत्रकार बनना चाहते हैं या प्रेस कार्ड की आड़ में ऐसे कृत्य करना चाहते हैं जो देश-समाज के लिये उचित नहीं, बल्कि उन्हीं लोगों को प्रेस कार्ड जारी करें जो सर्वसमाज के दबे-कुचले, शोषित और पीड़ित लोगों की समस्याओं को उठाना चाहते हों यानी कि वास्तव में पत्रकारिता करना चाहते हैं।

पत्रकारिता के पवित्र कार्य को बदनाम ना होने दें
देखने को मिल रहा है कि पुलिस अधिकारियों ने आज व्हाट्सअप ग्रुपों को अलविदा कह दिया है। शायद उन्होंने अच्छा व सराहनीय कदम उठाते हुए आज की घटिया पत्रकारिता का आइना दिखाया है। वहीं यह विचारणीय है कि प्रेस अथवा मीडिया में कितनी गिरावट आ चुकी है ?

लेखक, प्रेस काउंसलिंग ऑफ इंडिया के सदस्य व वरिष्ठ पत्रकार - श्याम सिंह पंवार

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