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Thursday, September 29, 2022

रायसेन, युवाओं ने शहीद भगत सिंह जी की जयंती के उपलक्ष्य में विचारिक क्रांति लाने का लिया प्रण।

युवाओं ने शहीद भगत सिंह जी की जयंती के उपलक्ष्य में विचारिक क्रांति लाने का लिया प्रण।

रायसेन, युवाओं ने शहीद भगत सिंह जी की जयंती के उपलक्ष्य में विचारिक क्रांति लाने का लिया प्रण।

घातक रिपोर्टर, राकेश दुबे, रायसेन।
रायसेन। शहीद भगत सिंह की जन्म जयंती के उपलक्ष्य में उनके प्रतिबिंब पर युवाओं ने फूल माला अर्पण कर दीप प्रज्वलित किए एवं उनको सहादत अर्पित की। युवाओं ने उनके विचारों पर चलने का संकल्प लिया। साथ ही युवा समाजसेवी सत्येंद्र सिंह राजपूत ने युवाओं को संबोधित करते हुए कहा कि आओ भगत सिंह को पुनः जीवित करें, भगत सिंह की कितनी भी जयंती मना लें, परंतु आज समाज और परिवार युवाओं को हिदायत देता नजर आता है छोड़ो ये देश और राजनीति की बातें, अपने करियर पर ध्यान दो। आजादी की लड़ाई के वक्त देश के लिए काम करना सबसे ज्यादा आदरसूचक कार्य माना जाता था। शायद वही वजह रही कि जान की परवाह किये बिना, आजादी के योद्धा रण में कूद जाते थे। युवाओं की वह परिभाषा आज के युवा वर्ग पर सटीक ही नहीं बैठती जो भगत सिंह के अंदर दिखाई देती थी। आज का युवा परिस्थिति के अनुसार बह जाता है या तो मोबाइल में व्यस्त रहता है या नशे में चूर। जिस उम्र में आज युवा सही और गलत का चुनाव नहीं कर पाते, उस उम्र में भगत सिंह अपने फासी के फंदे को चूम रहे थे। भगत सिंह में जुनून, हिम्मत और देश के लिए पागलपन था। भगत सिंह के अंदर अतुलनीय साहस और निडरता थी। जो उन्हें अपने परिवार से भी सीखने मिला और पुस्तकों से भी। विचारों का सशक्तिकरण उतना ही आवश्यक है जितना शरीर का बलिष्ट होना। भगत सिंह बहुत पढ़ते थे। पढ़ने और लिखने से उनका बहुत जुड़ाव था। जेल में जो कोई भी उनसे मिलने जाता था, उसे एक किताब लेके जाना पड़ता था। ऐसा कहा जाता है की वह जेल में महीने भर में 100 से ज्यादा किताबें पढ़ लेते थे। उन्होंने ब्रिटिश इतिहास को पढ़ा, लेनिन जैसे बहुत से विचारकों का भी अध्ययन किया। जब भगत सिंह को फांसी के लिए लेके जाने वाले थे उस समय भी वह पुस्तक पड़ रहे थे। जेल में उन्होंने अपने क्रांतिकारी विचारों को लेखन में भी उतारा था। दुर्भाग्यवश अंग्रेजों ने उन्हें नष्ट कर दिया और कभी वह विचार किसी के सामने नहीं आ पाए। हालांकि, भगत सिंह द्वारा लिखे गए पत्रों में उनके विचारों का अंकन महसूस किया जा सकता है। इन्हीं पत्रों में से एक पत्र में उन्होंने लिखा था कि किसी को चुप कराना हो तो, पढ़ो, अपनी तार्किक शक्ति को बढ़ाओ। आज देश का युवा केवल नौकरी पाने के लिए अध्ययन करता हुआ दिखता है। महान विचारकों को पड़ना और समझना उन्हें समय की बर्बादी लगती है। रामपाल सिंह ने कहा जब एक राष्ट्र, एक वोट, एक नोट एवं भारत का प्रत्येक नागरिक एक समान है तो हमारे देश में दोहरी शिक्षा नीति क्यों हैं। उद्योगपतियों-अधिकारियों के बच्चे सीबीएसई बोर्ड एवं तरकीय शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। जबकि किसान-मजदूर की बेटियों को सरकारी स्कूल में सदियों से चला आ रहा सिलेबस पढ़ाया जाता है। देश में सामान शिक्षा के लिए कानून बनना चाहिए क्योंकि शिक्षा पर सबका सामान अधिकार है एवं सभी ने अपने-अपने विचार साझा किए। इस मौके पर सुलतानगंज थाना स्टाफ सहित अंकुर जैन, दीपेंद्र ठाकुर, जय गुप्ता, शिवांश गोस्वामी, रोहित राजपूत, मनीष अमन, आदेश, सहित समस्त युवा मौजूद रहे।

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