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Saturday, November 26, 2022

चंबल परिवार का सूबेदार मेजर अमानत अली और उनके सह क्रांति योद्धाओं की याद में हुआ एतिहासिक आयोजन।

चंबल परिवार का सूबेदार मेजर अमानत अली और उनके सह क्रांति योद्धाओं की याद में हुआ एतिहासिक आयोजन।

  • 151 फीट तिरंगे से चंबल अंचल के रणबांकुरों को दी गई सलामी, लोकगायकी के अलावा संविधान की प्रस्तावना का भी हुआ सामूहिक स्वरपाठ।

चंबल परिवार का सूबेदार मेजर अमानत अली और उनके सह क्रांति योद्धाओं की याद में हुआ एतिहासिक आयोजन।

घातक रिपोर्टर, शिवेंद्र सिंह सेंगर, उत्तर प्रदेश।
औरैया। पंचनद धामः कभी कुख्यात डाकुओं और बागियों की शरणस्थली के रूप में बदनाम रहे पांच नदियों के संगम पंचनदा को चंबल परिवार के निरंतर विविध आयोजनों से अब नई पहचान मिल रही है। सिंध, पहुंज, क्वारी, चंबल और यमुना के पवित्र और अनोखे संगम पर संविधान दिवस के अवसर पर आगामी 26 नवंबर को पंचनद दीप महापर्व का ऐतिहासिक आयोजन होने जा रहा है। पंचनद दीप महापर्व के तीसरे संस्करण की तैयारियों को अंतिम रूप दिया जा रहा है। चंबल परिवार प्रमुख क्रांतिकारी लेखक डॉ. शाह आलम राना ने पंचनदा तहजीब की वकालत करते हुए कहा कि इटावा, औरैया, जालौन और भिंड जनपद मुख्यालयों से समान दूरी पर पंचनदा है। विश्व में यही एक मात्र स्थल है, जहां पर पांच नदियों चंबल, यमुना, क्वांरी, सिंध और पहूज नदियों का पवित्र संगम के साथ साथ भोगौलिक मिलन होता है। पंचनद घाटी में कई संस्कृतियों के मिलन का पुराना गौरवशाली इतिहास रहा है। इटावा जिला बनने से पूर्व यह पूरा इलाका ग्वालियर स्टेट के अधीन रहा है। आजादी आंदोलन में यह जमीन अंचल के क्रांतिवीरों के साझे शहादत का गवाह रही है। भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के जानकार डॉ. शाह आलम राना कहा कि पंचनद दीप महापर्व के तीसरे वर्ष के आयोजन में इस बार महान क्रांतियोद्धा सूबेदार मेजर अमानत अली को शिद्दत से याद किया जाएगा। इस दौरान 151 फीट तिरंगे से आजादी के दीवानों को सलामी दी जाएगी। गौरतलब है कि आजादी के महासमर का बिगुल बजते ही ग्वालियर स्टेट के बिग्रेडियर पलटन के सूबेदार और चंबल निवासी मेजर अमानत अली ने 14 जून 1857 को ग्वालियर में विद्रोह कर सेना के सभी अधिकारियों का वध कर दिया था। ग्वालियर की यह पलटन अति प्रशिक्षित और पराक्रमी थी। अमानत अली के नेतृत्व में उनकी इस रेजीमेंट ने 16 जून की रात्रि में इटावा आकर अंग्रेज कलेक्टर एओ ह्यूम सहित सभी अंग्रेज अधिकारियों को बंदी बना लिया और 17 जून 1857 को इटावा को अंग्रेजी दासता से स्वतंत्र करा दिया था। इतना ही नहीं जेल तोड़कर सभी बंदियों को एक बार फिर आजाद कर दिया। रोने-गिड़गिड़ाने पर ह्यूम और उसके कारिंदो को कैद से मुक्तकर भाग जाने को कह दिया। उसी फौज का उपयोग करके अमानल अली ने तात्या टोपे के नेतृत्व में 19 नवंबर को कालपी और 22 नवंबर 1857 को कानपुर पर पुन: जीत हासिल किया था। इसी विद्रोही सेना ने कंपनीराज के पिट्ठू चरखारी रियासत पर चढ़ाई करके तीन लाख रूपये और 33 तोपे छीन लीं थी। मेजर अमानत अली के समान ही उनके भतीजे जहांगीर खान ने भी 1857 के विद्रोह में प्रमुख भूमिका निभाई थी। जहांगीर खान भी ग्वालियर ब्रिगेडियर पलटन में सिपाही थे। उन्होंने अपने चाचा अमानत अली के साथ ही विद्रोह का शंखनाद किया था। विद्रोह के समय सिंधिया की फौज का सेनानायक रेम्से और ग्वालियर का ब्रिटिश पॉलिटिकल एजेंट मेकफरसन अंग्रेज नागरिकों को लेकर आगरा के लिए भाग खड़ा हुआ। खबर मिलने पर जहांगीर खान ने उन्हें मुरैना-धौलपुर के बीच घेर लिया तथा अपनी सैन्य शक्ति के बल पर उन्हें बंदी बना लिया था। ग्वालियर में 18 जून 1858 को क्रांतिकारियों की हार के बाद मध्य अक्टूबर 1858 में मेजर अमानत अली को ग्वालियर में बंदी बना लिया गया तथा इटावा की घटना के लिए इटावा में मुकदमा चलाकर मृत्युदंड देकर आगरा ले जाकर फांसी पर चढ़ा दिया गया था। आजादी के अमृत वर्ष में चंबल परिवार ने जननायक सूबेदार मेजर अमानत अली को अंचल के नई पीढ़ी से परिचित कराने का बीढ़ा उठाया है। पंचनदा तहजीब की शानदार साझी विरासत का जिक्र करते हुए डॉ. शाह आलम राना ने बताया कि बाबा मुकुंददास, नबी शाह, मलंगदास, बाबा साहेब जैसे ज्ञानी संतों-ज्ञानियों की एक साथ रहकर समाज को दिशा देने की रवायत आज भी यहां के लोगों की जुबां पर है जो कि एक नजीर रही है। यहां का सबसे बड़ा स्टेट जगम्मनपुर जो कि सेंगर वंश से है जिसके राजचिन्ह में शेर और बकरी एक साथ बने हुए हैं। इसके पीछे भी दिलचस्प कहानी है। सूफी फकीर सुल्तान शाह के मुरीद होने से यह सेंगर राज वंश आज भी अपने नाम के टाइटिल में शाह लिखता है। जैसे महाराजा जगम्मन शाह, जोगेंद्र शाह, जागेंद्र शाह, महीपत शाह, तखत शाह, बखत शाह, मानवेंद्र शाह, राघवेंद्र शाह, रूप शाह, लोकेंद्र शाह, वीरेंद्र शाह, राजेंद्र शाह, सुकृत शाह तक गौरवशाली शाह लिखने की परंपरा आज तक कायम है। पंचनदा तहजीब की मिली जुली रवायत पांच नदियों की स्वच्छ विशाल जलराशि की तरह हमारे जेहन को तरोताजा कर रही है। पंचनद दीप महापर्व के तीसरे वर्ष के आयोजन की तैयारियों को लेकर जुटे चंबल परिवार समन्वयक वीरेन्द्र सिंह सेंगर ने बताया कि हमारे देश की आन, बान और शान तिरंगे झंडे से स्वतंत्रता संग्राम के महान योद्धाओं को सलामी दी जाएगी। 151 फिट का तिरंगा लेकर चंबल अंचल के निवासी महाकालेश्वर धाम, इटावा की सीमा से निकलकर जालौन जनपद के बाबा साहेब मंदिर के नीचे पांच नदियों की विशाल जलराशि के नजदीक कारवां का रूप लेगा। यहीं पर दीप जलाकर अपने लड़ाका पुरखों को याद किया जाएगा। पंचनद घाटी के वरिष्ठ पत्रकार वीरेन्द्र सिंह सेंगर ने चंबल अंचल वासियों से दीप महापर्व में अपने सभी क्रांतिकारी परिवारों विशेष रूप से चंबल अंचल के सभी लोगों से पुरजोर सहयोग की अपील की है। पंचनद दीप महापर्व आयोजन समिति से जुड़े चन्द्रोदय सिंह चौहान ने बताया कि संविधान दिवस के अवसर पर  सांस्कृतिक संध्या का आयोजन हो रहा। चंबल अंचल के प्रसिद्ध लोक गायक सद्दीक अली सरोकारी प्रस्तुतियां देंगे। इसी दौरान संविधान की प्रस्तावना का सामूहिक स्वरपाठ किया गया। दरअसल भारतीय संविधान की प्रस्तावना को संविधान की आत्मा कहा जाता है। आइए हम अपने संविधान की प्रस्तावना को अपने जीवन में उतारें। जो कि इस प्रकार है। हम, भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए, तथा उसके समस्त नागरिकों को: सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता, प्राप्त कराने के लिए,तथा उन सब में, व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित कराने वाली, बन्धुता बढ़ाने के लिए, दृढ़ संकल्पित होकर अपनी संविधान सभा में आज तारीख 26 नवम्बर 1949 ई. (मिति मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी, संवत दो हजार छह विक्रमी) को एतद्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।

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