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Tuesday, December 8, 2020
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संपादकीय, प्रसंगवश; धर्म को बचाने जब भगवान श्रीकृष्ण ने गांधारी और दुर्योधन की चाल को विफल करने के लिए क्या चली चाल व कैसे करते है कौरवों का सम्पूर्ण विनाश।
संपादकीय, प्रसंगवश; धर्म को बचाने जब भगवान श्रीकृष्ण ने गांधारी और दुर्योधन की चाल को विफल करने के लिए क्या चली चाल व कैसे करते है कौरवों का सम्पूर्ण विनाश।
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धार्मिक और पौराणिक ग्रंथ "महाभारत" की प्रसंगिकता आज के जीवन में और ज्यादा महत्वपूर्ण जब हो जाती है जब राजनीति, प्रशासनिक और लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ (पत्रकारिता) के साथ ही धर्म का चोला पहने कुछ व्यक्ति अपने आपको दुर्योधन और शकुनि समझ दुर्योधन और शकुनि जैसी चालें चलते हैं। हालांकि इस परिद्रश्य मैं सभी को नहीं लिया जा सकता, आज भी बहुतायत अपने कर्म को धर्म के अनुसार रखते है जिनके कारण ही आज भी मानव जीवन चल रहा है अन्यथा आज परिस्थियां आम आदमी के जीवन जीने के अनुकूल नहीं होती। "महाभारत" में एक तरफ 99 कौरव पुत्र मारे गए दूसरी तरफ सकुनी की सभी चालें विफल गयी इसको देख गांधारी को पुत्र मोह सताने लगा और गांधारी को अपना शंकर भगवान का दिया हुआ वरदान याद आने लगा। गांधारी ने दुर्योधन को बचाने के लिए अपनी प्रतिज्ञा को भी तोड़ने का निश्चय कर लिया, गांधारी ने दुर्योधन को जब गंगा स्नान के बाद अपने सामने निवस्त्र खड़ा होने के लिए कहा ताकि दुर्योधन वज्र का हो जाए और भीम की गदा के वार का कोई भी प्रभाव दुर्योधन के ऊपर ना पड़े और युद्ध को आसानी से दुर्योधन जीत जाए इसलिए गांधारी ने अपने प्रतिज्ञा को भी तोड़ने का निश्चय कर लिया मगर भगवान श्रीकृष्ण तो स्वयं भगवान थे उनको सारी परिस्थितियां स्पष्ट नजर आ रहीं थीं। दुर्योधन और गांधारी की चाल को विफल करने के लिए भगवान श्री कृष्ण ने भी उनकी कुटिल चालों में ही अपनी चालें शामिल कर दी, गंगा स्नान के बाद जब दुर्योधन निवस्त्र अवस्था में अपनी माता गांधारी की तरफ जाने लगा तो भगवान श्रीकृष्ण रास्ते में आए और दुर्योधन का उपहास करने लगे, अपनी माता के सामने क्या तुम इसी अवस्था में जाओगे, बचपन की अवस्था अलग थी अब यौवन अवस्था में माता के सामने निवस्त्र अवस्था में खड़ा होना उचित होगा। ऐसा उपहास करते-करते दुर्योधन को इतना उत्तेजित कर दिया की दुर्योधन को समझ आने लगा कि अपनी माता गांधारी के सामने निवस्त्र अवस्था में खड़ा होना उचित नहीं है। इसलिए कम से कम शरीर के कुछ हिस्से (कमर के नीचे) पर केले के पत्ते लगा लिया जाए और केले के पत्ते लगाकर दुर्योधन अपनी माता गांधारी के सामने खड़ा हो गया। यहीं से भगवान श्रीकृष्ण की चालें सफल होने लगी क्योंकि जहां दुर्योधन यह समझता था की गदा युद्ध में कमर से नीचे वार नहीं किया जाता तो वह हिस्सा अगर कमजोर भी रह जाएगा तो मेरा कुछ नहीं बिगड़ेगा मगर दुर्योधन यह भूल गया वह स्वयं युद्ध नीति से ना चलकर कुटिल चालों से ही युद्ध जीतना चाहता था तो वह भीम से यह उम्मीद क्यों लगाए बैठा था कि भीम युद्ध केवल युद्ध नीति से ही लड़ेगा ओर भीम कमर के नीचे वार नहीं करेगा। हालांकि भगवान श्रीकृष्ण सब जानते थे अधर्म के सामने अधर्म से ही लड़कर युद्ध जीता जा सकता है। भीम व दुर्योधन मैं जब गदा युद्ध होने लगा तो जहां एक तरफ दुर्योधन की गदाओ के वार से भीम परेशान होने लगे वही भीम की गदाओं के वार दुर्योधन पर कोई प्रभाव नहीं डाल पा रहे थे क्योंकि दुर्योधन तो वज्र का हो चुका था। भगवान कृष्ण को तो सब कुछ पता था कुछ समय युद्ध में संयम रखने के साथ जब लगने लगा कि भीम अपना धैर्य खोने लगे हैं तो भगवान श्री कृष्ण ने गदा युद्ध के नियमों को तोड़कर भीम को इशारा कर दुर्योधन की कमर से नीचे भीम से गदा के बार करवाएं जिससे कि दुर्योधन से गदा युद्ध जीता जा सके और हुआ भी यही भीम ने दुर्योधन के कमर से नीचे गदाओं का वारकर युद्ध को जीत लिया व इसी के साथ कौरवों का सम्पूर्ण विनाश हो गया।
यहां यह प्रसंग आज के दौर में इसलिए ज्यादा महत्वपूर्ण है कि जो व्यक्ति राजनीतिक, प्रशासनिक, पत्रकारिता या धर्म का चोला पहनकर कुटिल चालों को चलकर समाज के लिए सही और नैतिक दिशा में काम करने वालों पर फर्जी मुकदमें लगाकर रोकने का कार्य कर रहे हैं तो ऐसे व्यक्ति यह उम्मीद कभी भी लगाकर नहीं बैठे की आप इन कुटिल चालों से युद्ध जीत सकते है। आपको कोई भगवन श्रीकृष्ण या युधिस्ठर नहीं मिलेंगे कुटिल चाल चलने वाले ध्यान रखें आपको भी भगवान श्रीकृष्ण किसी भी दिन किसी को भीम बना कर युद्ध नीति के नियम तोड़कर आपको अवश्य ही परास्त करेंगे।
संपादक, घातक रिपोर्टर, अरविंद सिंह जादौन की कलम से
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