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Saturday, March 6, 2021
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रायसेन/बरेली, लोगों में अभी भी जागरूकता का आभाव, ऐसे कैसे होगी मां नर्मदा प्रदूषण मुक्त।
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घातक रिपोर्टर, राकेश दुबे, रायसेन/बरेली।
बरेली। क्षेत्र के नर्मदा तटों पर श्रद्धा जब देखी जाती है तब या कोई आमावस या फिर मकर संक्रान्ति और या फिर आज का दिन, इन दिनों के बाद तटों के आसपास प्रदूषण ही प्रदूषण दिखाई देता है जबकि पूर्व सरकार ने करोडों रूपये नर्मदा सेवा यात्रा के नाम पर खर्च किये लेकिन यह सेवा सिर्फ नाम की ही सेवा रही। आज भी गंदगी और कचरे के ढेरों से सराबोर हो रहे हैं नर्मदा तट।
सबसे शांत क्षेत्र कहलाने वाले अलीगंज, मांगरोल, बगलवाडा, भारकच्छ नर्मदा तट पर सैकडों लोग प्रतिदिन भंडारों का आयोजन करते हैं। नर्मदा जी की रेत में लोग बैठकर भोजन कार्यक्रम का आयोजन तो करते हैं पर भोजन के बाद गंदगी कचरा वहीं छोडकर चले जाते हैं जिस कारण नर्मदा तटों पर प्रदूषण फैलता तो है ही साथ ही सारी गंदगी मां नर्मदा के पानी में पहुंच जाती है।
नर्मदा तट अलीगंज में अंतिम संस्कार के लिए स्थाई दो मुक्ति एंगिल वर्षाे से बने हुए हैं जब भी किसी का निधन होता है उसे यहां पर लाया जाता है अंतिम संस्कार के बाद तटों के आसपास कपडे, लकड़िया सहित अन्य सामाग्री पडी रहती है जो तेज हवा चलने पर पानी में पहुंच जाती है। ऐंसा नही कि अलीगंज नर्मदा तट पर ही ऐंसा हो रहा है बल्कि अन्य नर्मदा तटों पर भी अंतिम संस्कार की रस्में निभाई जाती है। जबकि प्रदेश के मुखिया शिवराज सिंह चौहान ने नर्मदा तटों पर होने वाले अंतिम संस्कारों पर रोक लगाई है फिर भी ग्राम पंचायतों के सरपंचों ने इस आदेश को फॉलो नही किया है।
मां नर्मदा किनारे कचरे का ढेर लगा हुआ है। वहां सफाई व्यवस्था में लगे समाजसेवी लोग भी यही करते हैं। मां नर्मदा में प्रदूषण नही करेंगे लेकिन यहीं बैठकर खाना खाते हैं और सारा कचरा वहीं ढेर लगा जाते हैं। यहीं ढेर धीरे-धीरे नर्मदा जी के पवित्र पानी में पहुंच जाता है। यहां पर इस अव्यवस्था को दूर करने के लिए किसी भी संगठन ने पहल नही की है।
बापोली धाम में 14 वर्ष तक तपस्या करने वाले लाल बाबा ने कहा है कि नर्मदा किनारे पर मेकल, व्याय, भृगु, अत्री और कपिल जैंसे ऋषियों के भी तप करने का उल्लेख पुराणों में मिलता है। यदि शंकराचार्य ने भी इस भूमि पर तप किया। इन संतों ने अपनी वाणी और संदेश से नर्मदा क्षेत्र का धार्मिक वातावरण को उदार बनाया है। उन्होने इस क्षेत्र को धर्मिक विविधता प्रदान करते हुए यहां सामाजिक समरसता को बढावा दिया है जो कि आज तक इस अंचल में विद्धमान है।
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