रायसेन/सिलवानी, श्रीमद्भागवत की कथा श्रवण करने के बाद पाप की प्रवृत्ति को त्यागें - आचार्य डॉ. रामाधार उपाध्याय। - Ghatak Reporter

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Saturday, March 6, 2021

रायसेन/सिलवानी, श्रीमद्भागवत की कथा श्रवण करने के बाद पाप की प्रवृत्ति को त्यागें - आचार्य डॉ. रामाधार उपाध्याय।

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श्रीमद्भागवत की कथा श्रवण करने के बाद पाप की प्रवृत्ति को त्यागें - आचार्य डॉ. रामाधार उपाध्याय।

रायसेन/सिलवानी, श्रीमद्भागवत की कथा श्रवण करने के बाद पाप की प्रवृत्ति को त्यागें - आचार्य डॉ. रामाधार उपाध्याय।

घातक रिपोर्टर, जसवंत साहू, रायसेन/सिलवानी।
सिलवानी। विकासखंड के ग्राम मढ़िया देवरी में कमलेश पटेल के यहां आयोजित श्रीमद् भागवत महापुराण कथा का समापन हो गया। इस अवसर पर कथा व्यास आचार्य डॉ. रामाधार उपाध्याय ने कहा कि व्यक्ति को अपने जीवन में पाप की प्रवृत्ति को त्यागना चाहिए। यह प्रेरणा हमें श्रीमद् भागवत महापुराण की कथा सुनने के बाद प्राप्त होती है, यदि जीवन में जाने अनजाने कोई पाप हो गया है तो उसका प्रायश्चित तो संभव है। लेकिन व्यक्ति अपने जीवन में सदैव पाप की प्रवृत्तियों से संयुक्त होकर पाप करते रहते हैं तो उनका प्रायश्चित कभी भी नहीं हो सकता। इसीलिए मनुष्य को चाहिए कि वह सदैव पवित्र आचरण करते हुए अपने जीवन का यापन करें। जानबूझकर किया गया पाप सदैव बीभत्स फल के रूप में मनुष्य को कष्ट देता है। आगे पंडित उपाध्याय जी ने कहा कि श्रीमद्भागवत महापुराण परमात्मा का साक्षात स्वरूप है। जो व्यक्ति श्रीमद्भागवत की कथा को श्रवण कर लेता है उसके जीवन में परमात्मा की कृपा प्राप्त तो होती ही है उसका अंतः करण भी पवित्र हो जाता है।

रायसेन/सिलवानी, श्रीमद्भागवत की कथा श्रवण करने के बाद पाप की प्रवृत्ति को त्यागें - आचार्य डॉ. रामाधार उपाध्याय।

इसीलिए चाहिए कि श्रीमद्भागवत की कथा को आत्मसात करें और चिंतन मनन के बाद उचित-अनुचित का ध्यान रखते हुए व्यक्ति को चाहिए की पवित्र आचरण करे। उन्होंने कहा कि कोई व्यक्ति किसी को ना सुख दे सकता है ना ही दुख दे सकता है। अपने द्वारा किए गए पूर्व के कर्मों के फल से ही व्यक्ति को अपने जीवन निर्वाह का माध्यम प्राप्त होता है। जीवन में सुख-दुख अपने पूर्व कृत कर्मों का ही परिणाम होते हैं इसलिए कर्म बड़ी पवित्रता से करनी चाहिए क्योंकि उनका फल आज नहीं तो कल मनुष्य को भोगना ही पड़ता है। पंडित उपाध्याय जी ने सुदामा चरित की कथा सुनाते हुए कहा कि व्यक्ति के जीवन में मित्रता का संबंध भी बड़ी पवित्रता से निर्वाह करना चाहिए। इसकी प्रेरणा हमें भगवान श्री कृष्ण और सुदामा की निस्वार्थ मित्रता से प्राप्त होती है। कथा में अनेक श्रद्धालु उपस्थित थे पूजन अर्चन एवं आरती के बाद कथा का विश्राम हुआ।

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