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Sunday, August 22, 2021
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8 लाख रुपए के इनामी नक्सली ने बहन के कहने पर कर दिया सरेंडर, 28 साल बाद बहन से मिला तो नहीं पहचान पाई थी बहन; बहन ने रोते हुए कहा था - हथियार डाल दे भाई।
8 लाख रुपए के इनामी नक्सली ने बहन के कहने पर कर दिया सरेंडर, 28 साल बाद बहन से मिला तो नहीं पहचान पाई थी बहन; बहन ने रोते हुए कहा था - हथियार डाल दे भाई।
छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में बहन के प्यार ने 8 लाख रुपए के इनामी खूंखार नक्सली दुर्गेश सोरी का जीवन बदल दिया। बहन के कहने पर उसने साल 2020 में हिंसा का रास्ता छोड़ दिया। इसके बाद यह रक्षाबंधन उसके लिए खास हो गया। 28 साल बाद पहली बार उसकी कलाई पर रक्षा की डोर सजी, हालांकि यह डोर सरेंडर करने वाली 5 लाख रुपए की इनामी एक महिला नक्सली जोगी ने बांधी। दुर्गेश को सरेंडर कराने वाली बहन ही उसकी कलाई पर राखी नहीं बांध सकी। उसे डर है कि कहीं बहन के बारे में पता चलने पर नक्सली उसे परेशान न करें। दरअसल, दुर्गेश सोरी बीजापुर जिले के नक्सल प्रभावित हिरमागुंडा गांव का रहने वाला है। जन्म के समय से ही इसकी दोनों सगी बड़ी बहनें परिवार से दूर दूसरे जिले में अपने रिश्तेदारों के यहां रहती थी। दुर्गेश जब करीब 12-13 साल का था तब नक्सली इसे अपने साथ ले गए थे, जिसे बाल संघम में भर्ती किया गया था। खूंखार नक्सली लीडर रमन्ना, गणेश उइके सहित अन्य बड़े नक्सली के साए में पला-बढ़ा है। दुर्गेश को नक्सलियों ने हथियार चलाना सिखाया और इसे कंपनी नंबर 2 में भर्ती कर लिया, यह नक्सलियों की सबसे मजबूत टीम है।
दुर्गेश ने बताया कि, नक्सल संगठन में रहते हुए 3 बड़ी घटनाओं में यह शामिल था। जिनमें सबसे पहले साल 2007 में पामुलवाया की घटना को अंजाम दिया था। इस मुठभेड़ में 11 जवान शहीद हुए थे। इसके बाद साल 2008 में तड़केर की पुलिस नक्सली मुठभेड़ में भी शामिल था जिसमें 6 जवानों की शहादत हुई थी। इसके अलावा 2 जवानों को बंदी बना कर ले गया था। जिसमें एक की हत्या कर दी थी तो वहीं दूसरे को छोड़ दिया था। दुर्गेश तड़केर की मुठभेड़ में घायल हो गया था, उसके पैर में गोली लगी थी। साथी जवान घटना स्थल से इसे उठाकर ले गए थे। फिर किसी तरह से इसका हैदराबाद में इलाज करवाया था। जहां बेहतर इलाज न मिलने की वजह से इसे फिर भद्राचलम लाया गया। पैर में गोली लगने के बाद दुर्गेश की फुर्ती थोड़ी कम हो गई थी। यह शारीरिक रूप से कमजोर हो गया था। जिसके बाद नक्सलियों ने उसे एक गांव में ही बैठा दिया था। जहां ये नक्सलियों की स्कूल में बच्चों को पढ़ाने का काम किया करता था।
दुर्गेश को पता चला कि उसकी दूसरी नंबर की बड़ी बहन बचेली में रहती है। पुलिस से छिपते-छिपाते अपनी बहन के पास उसके घर पहुंच गया। पहले तो बहन पहचान नहीं पाई, लेकिन जब इसने परिवार के सारे सदस्यों और माता-पिता के बारे में बताया तो उसने गले लगा लिया। जन्म के बाद 28 साल बाद पहली बार दोनों भाई-बहन ने एक दूसरे का चेहरा देखा। दुर्गेश ने नक्सल संगठन से लेकर मुठभेड़ और पैर में गोली लगने तक की सारी बातें बहन को बताई। उस समय बहन ने कहा पहले सरेंडर कर हिंसा का रास्ता छोड़ दो, फिर मुझे अपना चेहरा दिखाना। इसके बाद दुर्गेश ने दंतेवाड़ा पुलिस के सामने हथियार डाल दिए। बड़ी बहन के प्यार ने भले ही भाई को मुख्यधारा में वापस ला दिया है, लेकिन दुर्गेश अब भी उससे मिलने नहीं जाता है। दुर्गेश को नक्सलियों का डर है, कहीं बहन के घर उसे आता-जाता देख पहचान उजागर न हो जाए। नक्सली उसे परेशान न करने लगे। दुर्गेश ने कहा कि बड़ी मुश्किल से मुझे मेरी बहन मिली है। भाई-बहन का प्यार क्या होता है कि मुझे अब समझ में आता है। संगठन में रहते कई जवानों की हत्या कर बहन से उसका भाई छीन लिया। भाई और बहन के बीच कितना प्यार होता है कि यह मुझे अब पता चल रहा है।
कटेकल्याण इलाके की रहने वाली नक्सली जोगी ने हाल ही में दंतेवाड़ा पुलिस के समाने आकर सरेंडर किया है। सरेंडर के बाद यह उसका पहला रक्षाबंधन है। जोगी का कोई सगा भाई नहीं है। उसने दुर्गेश को ही अपना भाई माना और पहली बार रक्षा सूत्र उसकी कलाई पर बांधा है। जोगी ने बताया कि आज तक वो किसी को भी राखी नहीं बांधी थी। यह पहला मौका था जब उसे भाई मिला है। राखी बांधने के बाद उसने दुर्गेश से कहा कि राखी का बंधन निभाना भइया।
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