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Tuesday, February 8, 2022

नरसिंहपुर/तेंदूखेड़ा, युवा पीढ़ी को संस्कारों की शिक्षा के साथ हमारी सनातनी संस्कृति का बोध कराना जरूरी।

युवा पीढ़ी को संस्कारों की शिक्षा के साथ हमारी सनातनी संस्कृति का बोध कराना जरूरी।

नरसिंहपुर/तेंदूखेड़ा, युवा पीढ़ी को संस्कारों की शिक्षा के साथ हमारी सनातनी संस्कृति का बोध कराना जरूरी।

घातक रिपोर्टर, धर्मेन्द्र साहू, नरसिंहपुर/तेंदूखेड़ा।
तेंदूखेड़ा। आज की युवा पीढ़ी को संस्कार शिक्षा दिलाये जाने की महती आवश्यकता है। हमारा देश विज्ञान के नाम पर नहीं बल्कि हमारी आध्यात्मिक सत्य सनातनी संस्कृति और महापुरूषों के पराक्रम के बलबूते पर ही हमें पहचाना जाता है और हमारी इस संस्कृति का अनुशरण बड़े-बड़े देश करते चले जा रहे है। लेकिन हम अपनी इस संस्कृति को भूलकर पाश्चात्य सभ्यता की ओर आगे बढ़ रहे है और बच्चों को भी आगे बढ़ा रहे है। आध्यात्मक के आगे विज्ञान नत्मस्तक है। शरीर में जीव रहते हुए हमें भगवान के दर्शन हो जाये यह हमारा सबसे बड़ा सौभाग्य है और धर्म के प्रति निष्ठा, गुरू के प्रति शिष्य का समर्पण, माता-पिता के आगे संतान का सेवा भाव ही जीवन के प्रमुख लक्ष्य है। युवा शक्ति को जाग्रत करने की आवश्यकता है। उपदेशों का पालन कर उन्हें आचरण में उतारना ही हमारी कथा सुनने की सार्थकता बनती है। उक्त अमृत वचन समीपी ग्राम पीपरवानी पान मृगन्नाथ धाम में 3 फरवरी से 9 फरवरी तक चल रही संगीतमय श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान यज्ञ सप्ताह के दोैरान कथा व्यास पं. कृष्णकांत जी शास्त्री के मुखाबिंद से व्यक्त किये गये। इस मौके पर बड़ी संख्या में जनसमूह एकत्रित था। यहां पर अनुष्ठानात्मक 12 वर्षीय श्री सीताराम महायज्ञ का आयोजन भी किया जा रहा है।

नरसिंहपुर/तेंदूखेड़ा, युवा पीढ़ी को संस्कारों की शिक्षा के साथ हमारी सनातनी संस्कृति का बोध कराना जरूरी।

मनाया श्री कृष्ण जन्मोत्सव

संगीतमय कथा श्रवण को लेकर काफी दूर-दूर से श्रोता श्रद्धालु मंत्र मुग्ध होकर कथा श्रवण कर रहे है। चौथे दिवस भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव धूम-धाम से मनाते हुए बधाई गीत गाये गये। इसी बीच कथा व्यास पं. शास्त्री ने कंस का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि वह अपनी बहिन देवकी के साथ बहुत ही प्रेम करता था। लेकिन दुष्ट व्यक्ति की सज्जनता ज्यादा देर तक नहीं चलती है। उसकी दुष्टता सामने आ ही जाती है। जीव कितना ही क्रूर क्यों न हो जब वह भगवान की शरण में आता है तो उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते है। भगवान को हम जिस रूप में देखते है वह हमें उसी रूप में प्राप्त होता है। मरने के बाद लोगों की तपस्या और संस्कार ही उसके साथ जाते है। संत की चाल विनम्रता और अहंकारी की चाल दुष्टता, समय का अपना एक अलग महत्व, प्रायश्चित, तप, भक्ति के बारे में चर्चा करते हुए त्रिकूट पर्वन समुद्र मंथन के बारे में चर्चा करते हुए कहा कि जीवन का विशाल ह्दय ही सागर है। मन रूपी मनद्राचल अर्थात सद्विचार ही मंद्राचल पर्वन है। भक्त के प्राण बचाने भगवान स्वयं नरसिंह अवतार लेकर खम्बे से प्रकट होना, प्रहलाद की भक्ति का उदाहरण भगवत नाम की महिमा के साथ कथा व्यास द्वारा राजा बेनकी सुंर्सत ऋषि को विज्ञान के जनक, उत्तानपाद के वंश पृथु भगवान के वरदान, ऋषभ देव की स्व संतानों, भरत की करूणा और करूणाशीलता का वर्णन जड़भरत तथा राजा शहगढ़ के अहंकार को नष्ट अजामल की भक्ति सहित विभिन्न दृष्टांतों पर काफी विस्तार से कथा में वर्णन किया गया। संगीत की सुमधुर रस विधाओं पर श्रोता थिरकने मजबूर हुए।

यज्ञ में छोड़ी जा रही आहूतियां

मृगन्नाथ धाम अपने आप में एक ख्यातिलब्ध प्रतिष्ठित स्थल है। धरातल से लगभग 1700 फुट ऊंचाई पर स्थित इस पहाड़ी पर मृगन्नाथ सरकार विराजमान है। यहां पर 12 वर्षों से श्री सीताराम नाम संर्कीतन जारी है। अनुष्ठान के दौरान प्रत्येक वर्ष श्री सीताराम महायज्ञ का आयोजन किया जाता है। इस वर्ष भी इस महायज्ञ में बड़ी संख्या में श्रद्धालु यज्ञ की परिक्रमा लगाकर धार्मिक लाभ अर्जित कर रहे है।

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