मैं ही काफी हूँ
मुझे परवाह नहीं किसी की—
कौन क्या कहता है, क्या सोचता है,
मैं अपनी राह का मुसाफ़िर हूँ,
जो ठोकरों में भी हौसला खोजता है।
मेरी परिस्थिति मेरे आगे सिर झुकाती है,
शोर-शराबा मेरा रास्ता रोक नहीं पाता,
मित्र हों या न हों—मैं अपने साथ खड़ा हूँ,
क्योंकि मेरा इरादा किसी से रोका नहीं जाता।
ईश्वर मेरे कदमों को दिशा देता है,
पर चलना तो मुझे ही पड़ता है,
मैं दिखावे में नहीं पड़ता,
मैं सच्चाई की आग में खुद को गढ़ता हूँ।
लोग क्या बोलते हैं—मुझे इससे फर्क नहीं,
उनकी आवाज़ें मेरे इरादों से हल्की हैं,
मैं बस मैं हूँ—सीधा, सच्चा, मजबूत,
और यही मेरी असली ताकत है।
जिस दिन मैंने ठान लिया—
मंज़िल भी कदमों में आती है,
मैं किसी की परछाईं नहीं,
मैं अपनी धूप खुद बनाता हूँ।
संपादक -
अरविन्द सिंह जादौन



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