मस्कुलर डिस्ट्रॉफी बीमारी पर भारी योगेश का जज्बा, की नई पीढ़ी के लिए संगीत का मंच सजाना है लक्ष्य |
बरेली,
हौसलों की उड़ान अगर ऊँची हो तो शारीरिक सीमाएँ भी रास्ता नहीं रोक पातीं। बरेली निवासी योगेश सिंह चौधरी इसकी जीवंत मिसाल हैं। मस्कुलर डिस्ट्रॉफी जैसी गंभीर और चुनौतीपूर्ण बीमारी से जूझते हुए भी योगेश ने अपने सपनों को कमजोर नहीं पड़ने दिया, बल्कि संगीत को अपना माध्यम बनाकर समाज और संस्कृति की सेवा में जुट गए।
एमएससी कंप्यूटर की पढ़ाई कर चुके योगेश सिंह चौधरी का सपना कभी देश की सरहद पर खड़े होकर सैनिक बनने का था, लेकिन बीमारी ने उनके शरीर को सीमाओं में बाँध दिया। इसके बावजूद उनका जज्बा कभी डगमगाया नहीं। उन्होंने जीवन की इस कठिन परीक्षा को स्वीकार करते हुए संगीत को अपना नया उद्देश्य बनाया और सुरों के माध्यम से समाज को जोड़ने का संकल्प लिया। उनकी सुरीली आवाज, आत्मा से निकले शब्द और भावनाओं से भरे भजन आज लोगों के दिलों तक पहुँच रहे हैं।
सुरों में बसी नर्मदा भक्ति और देश प्रेम
योगेश अपने यूट्यूब चैनल “Bareli Music World” के माध्यम से स्वरचित भजनों और गीतों की प्रस्तुति कर रहे हैं। “मातु नर्मदा तेरी चंचला”, “कल-कल बहती माई नर्मदा” जैसे नर्मदा भक्ति से ओतप्रोत भजनों के साथ-साथ हनुमान जी, भगवान विष्णु और देशभक्ति से जुड़ी रचनाओं के जरिए वे संस्कृति और राष्ट्रप्रेम का संदेश दे रहे हैं। उनके इस संगीत सफर में गुरु देवेंद्र शर्मा, रामसहाय शर्मा का मार्गदर्शन और मुकेश मेहरा व राकेश गुप्ता का साथ उन्हें निरंतर संबल प्रदान कर रहा है, जो स्वयं में प्रेरणादायक है।
बरेली के भविष्य के लिए एक बड़ा सपना
योगेश का संगीत किसी प्रतिस्पर्धा के लिए नहीं, बल्कि सेवा और सृजन के लिए है। उनका सपना केवल एक सफल संगीतकार बनना नहीं, बल्कि बरेली और आसपास के युवाओं के लिए एक ऐसा संगीत मंच तैयार करना है, जहाँ छिपी हुई प्रतिभाओं को पहचान, मंच और मार्गदर्शन मिल सके। वे चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ी संगीत और संस्कृति के क्षेत्र में बरेली का नाम रोशन करे और यह क्षेत्र एक नई पहचान बनाए।
योगेश कहते हैं, “मेरा शरीर सीमित हो सकता है, लेकिन मेरे सपने बरेली के लिए असीमित हैं। मुझे सिर्फ थोड़े से सहयोग और साथ की जरूरत है।” उनके ये शब्द उनके अदम्य साहस और समाज के प्रति समर्पण को दर्शाते हैं।
सहयोग की अपील – प्रतिभा को है संसाधनों की दरकार
वर्तमान में योगेश सिंह चौधरी एक छोटी सी फोटोकॉपी की दुकान चलाकर अपना जीवन यापन कर रहे हैं। आर्थिक सीमाओं और गंभीर बीमारी के इलाज के बीच उनकी सबसे बड़ी चुनौती यह है कि उनके पास अपनी कला को आगे बढ़ाने के लिए बुनियादी संगीत संसाधन तक उपलब्ध नहीं हैं। न उनके पास कीबोर्ड है, न ढोलक और न ही तबला। इसके बावजूद वे हार नहीं मान रहे और सीमित साधनों में भी अपनी कला को जीवित रखे हुए हैं।
यदि समाज, जनप्रतिनिधि और शासन-प्रशासन योगेश जैसे जुझारू और प्रतिभाशाली युवा का हाथ थाम ले, तो यह केवल एक कलाकार की मदद नहीं होगी, बल्कि बरेली को संगीत और संस्कृति के क्षेत्र में एक नया आयाम मिलेगा। योगेश की कहानी सिर्फ संघर्ष की नहीं, बल्कि उम्मीद, जज्बे और सकारात्मक सोच की कहानी है, जो नई पीढ़ी को आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।



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