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Saturday, March 20, 2021
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रायसेन/मंडीदीप, नैत्र विशेषज्ञ न होने के साथ जानकारी के अभाव में बढ़ रहे ग्लूकोमा के मरीज, बीते वर्ष नगर में मिले थे 19 रोगी।
रायसेन/मंडीदीप, नैत्र विशेषज्ञ न होने के साथ जानकारी के अभाव में बढ़ रहे ग्लूकोमा के मरीज, बीते वर्ष नगर में मिले थे 19 रोगी।
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घातक रिपोर्टर, दीपांशु सिंह जादौन, रायसेन/मंडीदीप।
मंडीदीप। मानव शरीर के सबसे महत्वपूर्ण अंग आंख को सुरक्षित रखने में स्वास्थ्य विभाग के स्थानीय अधिकारी बिल्कुल भी गंभीर नहीं हैं। अधिकारियों द्वारा नेत्र रोग की रोकथाम को लेकर जमकर कोताही बरती जा रही है। यह चिंताजनक स्थिति तब है जब स्वास्थ्य विभाग द्वारा हाल ही में 7 से 13 मार्च के मध्य ग्लूकोमा सप्ताह मनाया गया। नैत्र विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर इस रोग की पहचान और जांच ही कारगर उपचार है परन्तु देखने में आ रहा है कि लोग आंखों को लेकर लापरवाह बने हुए है। इसके अलावा उनमें ग्लूकोमा की जानकारी का भारी अभाव है। यही कारण है कि मोतियाबिंद की ही तरह ग्लूकोमा के मरीजों में भी तेजी से बढ़ोत्तरी हो रही है। इसकी सच्चाई का पता नगर स्थित सेवा सदन के विजन केयर सेंटर में दर्ज आंकडों को देखकर लगाया जा सकता है। बीते वर्ष जांच में यहां मोतियाबिंद के 450 रोगी मिले थे। वहीं इसी दरमियान ग्लूकोमा के 19 मरीज मिले। नगर में ग्लूकोमा के बढ़ते रोगी चिंता का विषय तो बन ही रहे हैं साथ ही इस गंभीर रोग की बढ़ती भयाभय स्थिति की ओर संकेत भी कर रहे हैं। लेकिन जिम्मेदारों की उदासीनता का आलम यह है कि ब्लॉक में नेत्र चिकित्सक का पद पिछले 4 साल से खाली पड़ा हुआ है। जिसे भरने की याद न तो विभागीय अधिकारियों को आई और न ही इस ओर क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों ने ध्यान दिया। इस कारण क्षेत्र में नेत्र रोग की रोकथाम नहीं हो पा रही है। वहीं नेत्र विकार से पीड़ित जरुरतमंदों को राजधानी के विभिन्न निजी अस्पतालों में मंहगा उपचार कराने को मजबूर होना पड़ रहा है। इस तरह जिम्मेदारों की अनदेखी का खामियाजा गरीब व असहाय लोगों को भुगतना पड़ रहा है। लेकिन जिम्मेदारों को इसकी कोई परवाह नहीं है। हाल ही में इस बीमारी के प्रति जागरूकता को लेकर ग्लूकोमा अवेयरनेस वीक चलाया गया। इसके तहत लोगों को ग्लूकोमा के प्रति जागरूक किया जाना था। परन्तु सब डिवीजन में इसको लेकर किसी तरह का जागरूकता अभियान नही चलाया गया। इस तरह स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों के लापरवाह पूर्ण रवैये के चलते मजदूर और ग्रामीणों को इसका नुकसान उठाना पड़ रहा है। यही कारण है कि जागरूकता की कमी से इस बीमारी से पीड़ित मरीजों की संख्या बढ़ रही है।
ग्लूकोमा में आंख के पर्दे की मुख्य नस (ऑप्टिव नरम) धीरे-धीरे क्षतिग्रस्त हो जाती है। जिससे दृष्टि कम होते होते एक वक्त के बाद पूरी चली जाती है। नस के क्षतिग्रस्त हिस्से का उपचार संभव नहीं है केवल जो हिस्सा स्वस्थ है उसे ग्लूकोमा नियंत्रण द्वारा बचाया जा सकता है। इसे समय रहते पहचानना और उपचार द्वारा नियंत्रित रखना आसान हो सकता है आमतौर पर इसके लक्षण जल्दी पहचान में नहीं आते हैं कुछ मामलों में रोगी को अचानक से तेज सिर दर्द उल्टी आना धुंधला देखने की समस्या हो सकती है।
नेत्ररोग विशेषज्ञ डॉ प्रेरणा उपाध्याय के अनुसार ग्लूकोमा का उपचार आई ड्रॉप, दवाओं, लेजर सर्जरी और परंपरागत सर्जरी या इन सभी विधियों की मदद से किया जा सकता है। किसी भी उपचार का लक्ष्य दृष्टि को होने वाले नुकसान को रोकना है। ऐसा इसलिए, क्योंकि ग्लूकोमा से रोशनी को अपूर्णनीय नुकसान पहुंचता है। अगर ग्लूकोमा का समय रहते पता चल जाए तो दवाओं या सर्जरी की मदद से इसका बेहतर तरीके से नियंत्रण किया जा सकता है। समय पर इलाज होने पर ग्लूकोमा के ज्यादातर रोगियों की नेत्र ज्योति बेहतर बनी रहती है।
औद्योगिक नगर में नेत्र विकार की समस्या तेजी से फैल रही है। इसके बनिश्पद रोकथाम के उपाय नहीं किए जा रहे हैं। इस रोग की बढ़ती भयावह स्थिति का पता पटेल नगर स्थित सेवा सदन के विजन केयर सेंटर में दर्ज आंकड़ों से चलता है। यहां के नेत्र सहायक विक्रम पटेल बताते हैं कि उनके यहां प्रतिदिन की ओपीडी में 15 से 20 लोग आते हैं जिनमें से कम से कम 2 लोगों को मोतियाबिंद की शिकायत होती है वे बताते हैं कि क्षेत्र की करीब 2 प्रतिशत आबादी मोतियाबिंद रोग से पीड़ित है जबकि 65 से 70 प्रतिशत लोग किसी ना किसी तरह के नेत्र रोग विकार से पीड़ित है।
नैत्र विशेषज्ञ की कमी तो पूरे जिले में है फिर भी हमने कर्मचारियों को ग़्लूकोमा के संभावित मरीजों के जांच करने के निर्देश दिए है। जो भी ऐसा मरीज मिलेगा। उसका जिला स्तर पर उपचार कराया जाएगा।
डॉ. दिनेश खत्री, सीएमएचओ रायसेन
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