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Thursday, March 25, 2021
रायसेन/बरेली, राम वनवास की कथा सुन भक्त भाव विभोर हो उठे।
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घातक रिपोर्टर, राकेश दुबे, रायसेन/बरेली।
बरेली। श्री नरसिंह टेकरी हनुमान मंदिर पर आयोजित श्रीराम कथा के पांचवे दिन कथा व्यास साध्वी डॉ. प्रज्ञा भारती ने अपने अमृतमय वाणी से कैकई संवाद और राम वनवास के प्रसंग का बडा ही मार्मिक प्रवचन दिया। अपनी सशक्त वाणी से उन्होंने श्रद्धालुओं को भावभिवोर कर दिया। अयोध्या में राम के राजतिलक की तैयारी, कैकेयी के कोप भवन में प्रवेश, राजा दशरथ द्वारा उनकी मनुहार में तीन वरदान देते हुए श्रीराम को वनवास की आज्ञा देना, सीता, लक्ष्मण सहित राम का वन गमन पारिवारिक, सामाजिक एवं राजनैतिक मूल्यों के प्रति साध्वी जी ने जागरुकता भरे संदेश दिए। उन्होंने कथा आरंभ करते हुए कहा कि राम के वन-गमन एवं कोपभवन के घटनाक्रम की जानकारी बाहर किसी को नहीं थी। कैकेयी अपनी जिद पर अडी हुईं थी। राजा दशरथ उन्हें समझा रहे थे। राम के निवास के बाहर भारी भीड थी, लक्ष्मण भी वहीं थे। महल में पहुंचकर राम ने पिता को प्रणाम किया फिर पिता से पूछा, क्या मुझसे कोई अपराध हुआ है। कोई कुछ बोलता क्यों नहीं। आप ही बताइए, माते।
इस पर कैकयी बोली महाराज दशरथ ने मुझे एक बार दो वरदान दिए थे। मैंने कल रात वही दोनों वर मांगे, जिससे वे पीछे हट रहे हैं। यह शास्त्र-सम्मत नहीं है। रघुकुल की नीति के विरुद्ध है। कैकेयी ने बोलना जारी रखा, मैं चाहती हूं कि राज्याभिषेक भरत का हो और तुम चौदह वर्ष वन में रहो। महाराज यही बात तुमसे नहीं कह पा रहे थे। राम संयत रहे उन्होंने दृढ़ता से कहा, पिता का वचन अवश्य पूरा होगा। भरत को राजगद्दी दी जाए मैं आज ही वन चला जाऊंगा। कथा व्यास साध्वी कहती हैं कि राम की शांत और सधी हुई वाणी सुनकर कैकेयी के चेहरे पर प्रसन्नता छा गई। उनकी मनोकामना पूर्ण हुई। राजा दशरथ चुपचाप सब कुछ देख रहे थे। इस मार्मिक कथा को डॉ साध्वी प्रज्ञा भारती ने जब रामायण की पांति पढ़-पढक़र सुनाया तो उपस्थित भक्तों की आंखें भी भर आई। कथा के अंत में कथा के मुख्य यजमान ज्योति अरविंद मालवीय ने शास्त्र और कथा वाचक की पूजन अर्चना की और उनसे आर्शीवाद लिया।
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