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Friday, March 26, 2021
वैदिक काल का नवान्नेष्टि यज्ञ पर्व है होली
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वैदिक काल में होली पर्व को नवान्नेष्टि यज्ञ कहा जाता था। खेत के अधकचे-अधपके अन्न को होलक या होला कहा जाता है। यज्ञ में हवन करके प्रसाद ग्रहण करने का विधान समाज में था। चूंकि इसमें होला का दहन होता है। इसी से इसका नामा होलिकोत्सव पड़ा। इस पर्व को नवसंवत्सर का आगमन तथा वसंतागम के उपलक्ष्य में किया हुआ यज्ञ माना जाता था। होली वस्तुतः किसानों के परिश्रम के फल का नया अन्न पैदा होने का त्यौहार है। नया अन्न सर्वप्रथम देवताओं को अर्पित करने की परम्परा भारत में प्राचीन काल से ही रही है, गीता में कहा है ‘तैर्दत्तानप्रदायेभ्दो यो भुंक्ते स्तेन एव सः।’ अर्थात् देवताओं को चढ़ाए बिना जो स्वयं खा लेता है वह चोर है। इसलिए जब-जब नया अन्न पैदा होता था तब-तब एक इष्टि (यज्ञ) होता था। श्रौतसूत्रों में इस कृत्य को आग्रायण इष्टि कहा गया है। मनु ने इसे नवशस्येष्टि कहा है। वैदिक काल में ऐसा ही एक उत्सव था। इन्द्रमह या इन्द्र ध्वज का उत्सव। तैत्तिरीय ब्राह्मण में इन्द्र को शुनासिर कहा गया है। यानि इन्द्र कृषि कर्म का भी देवता था। संस्कृत साहित्य में वसन्त और वसंतोत्सवों का व्यापक वर्णन मिलता है। आज भी लोग घर से लाए खेडा, खांडा और बडकूलों को होली में डालकर गेहूं, जौ, गेहूं की बाली और हरे चने के झाड़ को सेंकते हैं। इसके पीछे यह भी भाव बताया जाता है कि इस समय नवीन धान्य जौ, गेहूं और चने की खेती पककर तैयार हो जाती है। इसलिए यज्ञेश्वर को नवीन धान अर्पण करके उनकी पूजा की जाती है। यज्ञ विधि से इसे अर्पित करके नवान्नेष्टि यज्ञ किया जाता है। प्राचीनकाल से आज तक भारत में होली को आनन्द के महोत्सव के रूप में मनाया जाता रहा है। सामाजिक रूप से इसे जनमानस की ऊंच-नीच की दीवार को तोड़ने वाला पर्व माना जाता रहा है।
कृषक इसे लहलहाती फसल काटने का तथा आनन्द-उल्लास का और भगवदीयजन इसे बुराई के ऊपर भलाई की विजय का पर्व मानते हैं। होली पर्व का मुख्य सन्देश है बुराइयों की, कटुताओं की, वैमनस्यता की, दुर्भावों की होली जलाई जाये, इनका दहन किया जाये और प्रेम का, सद्भाव का, सदाचार का रंग सब पर बरसाया जाए। डॉ. हरिसिंह पाल ने अपने एक आलेख में एक प्राचीन श्लोक का उल्लेख किया है, जिसमें कहा गया है- गन्ध, माला, भूषण तथा वस्त्रों से अलंकृत पुरुष और स्त्रियाँ नदी में अवभृथ स्नान करने के लिए गईं। वहाँ युवतियाँ तेल, गोरस, सुगन्धित जल, हल्दी और कुंकुम आदि से एक-दूसरे को रंगने लगी। घत्तियी (चर्मयन्त्र) से अपने देवरों और प्रियजनों को भिगो रही थीं। ये घत्तियाँ ही आधुनिक पिचकारियों की आदिरूप थीं। महाकवि माघ (750 ई.) ने पिचकारी का वर्णन किया है। शृंगानि द्रुत कनकोज्वलानि गन्धाः, कौसुम्भपृथु कुचकुम्भ सार्गवासः माद्वीक प्रियतम सान्निधानमासन्नारीणामिति जल केलि साधनानि। तप्त स्वर्ण के समान उज्ज्वल केशरिया रंग का विशाल स्नानाच्छादन, वस्त्र प्रक्षालन तथा प्रियजनों का सान्निध्य नारियों के जल क्रीड़ा के साधन थे। होलिका पर्व अपने मूल रूप में वसन्तोत्सव और नई फसल का पर्व है।
जैन मुनि विहसंत सागर महाराज होली के त्योहार का उल्लेख जैन दर्शन में नहीं मिलता। लेकिन त्योहारों की श्रृंखला में यह आपसी प्रेम बढ़ाने का प्रतीक है। इसलिए हमें इस दिन अपने अंदर की गंदगी को बाहर निकालना चाहिए। यानी जो करना है सो करो पर आपस में प्रेम बनाए रखो। हम सूखी होली खेलें, गंदी होली न खेलें, पानी की बर्बादी न करें और मन से गंदगी निकालने का काम करें। आपसी भाईचारे को बढ़ावा मिले इसलिए जैन धर्मानुयायी भी इस पर्व को उल्लासपूर्वक मनाते हैं। कुछ लोग इस पर्व को अग्नि देव का पूजन मात्र मानते हैं। इस दिन मनु का जन्म भी हुआ मानते हैं। अतः इस पर्व को मन्वादि तिथि भी कहते हैं। वैदिक पुराणों के मुताबिक ऐसी भी मान्यता है कि जब भगवान शंकर ने अपनी क्रोधाग्नि से कामदेव को भस्म कर दिया था। तभी से इसका प्रचलन हआ। भविष्य पुराण के अनुसार नारदजी ने महाराज युधिष्ठर से कहा था कि हे राजन! फाल्गुन पूर्णिमा के दिन सभी लोगों को अभय दान देना चाहिए ताकि सारी प्रजा उल्लासपूर्वक हंसे। विभिन्न प्रकार की क्रीड़ाएं करे। होलिका का विधिवत पूजन करे और अट्टहास करते हुए यह त्योहार मनाएं। वाराणसी के अस्सी मोहल्ला में तो इस दिन रात्रि को बहुत चर्चित कविसम्मेलन होता है, जिसमें बड़े बड़े कवि पहुंचते हैं, शासन के किसी पड़े पदाधिकारी या ओफिसर को मुख्य अतिथि बनाया जाता है और चर्चित नेताओं, मशहूर हस्तियों पर अश्लील कवितापाठ होता है। यहां तक कि मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री को भी नहीं बख्शा जात है। अंत में उनसे माफी मांग ली जाती है। ये जगह जगह का उल्लास का पर्व मानाने का अपना अपना अंदाज है। उद्देश्य एक ही भले ही लट्ठमार होली खेंलें लेकिन आपसी प्रेम भाईचारा बढ़े।
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