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Friday, November 5, 2021
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कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को गोवर्धन और गो पूजा का विशेष महत्व, क्यों छोटी होती जा रही है गोवर्धन पर्वत की ऊंचाई।
कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को गोवर्धन और गो पूजा का विशेष महत्व, क्यों छोटी होती जा रही है गोवर्धन पर्वत की ऊंचाई।
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आईबीएन और तहलका यूट्यूबर दलाल अजय आहूजा का यह खेल कोई नया नहीं, यह सब ब्लैकमेल करने का इसका पुराना तरीका।
https://www.ghatakreporter.com/2020/12/blog-post_842.html
इस दलाल की जब हमने पोल खोलना प्रारंभ की तो इसने हमारी हत्या की साजिश रची तो एक लेख इसके लिये हमने लिखा नीचे लिंक को खोलकर अवश्य पढ़ें
https://www.ghatakreporter.com/2020/12/blog-post_529.html
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Chief Editor GHATAK REPORTER
BHOPAL
घातक रिपोर्टर, राकेश दुबे, रायसेन।
रायसेन। दीपावली के दूसरे दिन यानी कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को गोवर्धन और गौ पूजा का विशेष महत्व है। आज गोवर्धन पूजा का पावन पर्व है। इस उपलक्ष्य में हम आपको गोवर्धन पर्वत के बारे में यह जानकारी बता रहे हैं। कान्हा की नगरी मथुरा में स्थित गोवर्धन पर्वत एक समय में दुनिया का सबसे बड़ा पर्वत था। कहा जाता है कि यह इतना बड़ा था कि सूर्य को भी ढ़क लेता था। इस पर्वत को भगवान श्रीकृष्ण ने द्वापर युग में अपनी उंगली पर उठाकर इंद्र के प्रकोप से ब्रज को लोगों की मदद की थी। गोवर्धन पर्वत को गिरिराज पर्वत भी कहा जाता है। इस पर्वत को लेकर धार्मिक मान्यता है कि यह पर्वत हर रोज तिल भर घटता जा रहा है। गोवर्धन पर्वत के तिल भर घटने की पीछे एक बेहद रोचक कहानी भी है। आइए जानते हैं आखिर क्या वजह है...
गोवर्धन पर्वत को देव तुल्य माना जाता है, 5000 वर्ष पूर्व गोवर्धन पर्वत की ऊंचाई 3000 मीटर थी जो अब घटकर 25-30 मीटर रह गई है। दूर-दूर से भक्त इस पर्वत की परिक्रमा लगाने आते हैं, बहुत कम लोग जानते हैं कि गोवर्धन पर्वत हर दिन छोटा होता जा रहा है। हर दिन इस पर्वत का आकार करीब एक मुट्ठी घट जाता है। एक धार्मिक कथा के अनुसार, एक बार ऋषि पुलस्त्य गिरिराज पर्वत के नजदीक से होकर गुजर रहे थे। इस पर्वत की खूबसूरती उन्हें काफी रास आई। ऋषि पुलस्त्य ने द्रोणांचल से आग्रह किया कि मैं काशी रहता हूं और आप अपना पुत्र गोवर्धन मुझे दे दीजिए, मैं इसे काशी में स्थापित करना चाहता हूं। द्रोणांचल ये बात सुनकर बहुत दुखी थे, हालांकि गोवर्धन ने संत से कहा कि मैं आपके साथ चलने को तैयार हूं, लेकिन आपको एक वचन देना होगा। आप मुझे जहां रखेंगे मैं वहीं स्थापित हो जाउंगा। पुलस्त्य ने वचन दे दिया। गोवर्धन ने कहा कि मैं दो योजन ऊंचा हूं और पांच योजन चौड़ा हूं, आप मुझे काशी कैसे लेकर जाएंगे। पुलस्त्य ने जवाब दिया कि मैं तपोबल के जरिए तुम्हें हथेली पर लेकर जाउंगा। रास्ते में जब बृजधाम आया तो गोवर्धन को याद आया कि भगवान श्रीकृष्ण बाल्यकान में लीला कर रहे हैं। गोवर्धन पर्वत पुलस्त्य के हाथ पर धीरे-धीरे अपना भार बढ़ाने लगा, जिससे उसकी तपस्या भंग होने लगी। ऋषि पुलस्त्य ने गोवर्धन पर्वत को वहीं रख दिया और वचन तोड़ दिया। इसके बाद ऋषि पुलस्त्य ने पर्वत को उठाने की कई बार कोशिश की, लेकिन वो उसे हिला भी न सके। तब ऋषि पुलस्त्य ने आक्रोष में आकर गोवर्धन को शाप दे दिया कि तुम्हारा विशालकाय कद रोज तिल-तिल कम होता रहेगा। कहते हैं कि तभी से गोवर्धन पर्वत का कद घटता जा रहा है।
हिंदू धर्म में गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा का बड़ा महत्व है। ऐसा कहा जाता है कि अगर कोई व्यक्ति चारों धाम की यात्रा नहीं कर पा रहा है तो उसे गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा जरूर करनी चाहिए, इससे मनचाहा फल प्राप्त होता है। गोवर्धन पर्वत तकरीबन 10 किलोमीटर तक फैला हुआ है। गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा लगभग 21 किलोमीटर की है, इसे पूरा करने में 5 से 6 घंटे का समय लगता है। ये पर्वत उत्तर प्रदेश और राजस्थान दो राज्यों में विभाजित है, कुछ दूर चलने के बाद राजस्थान वाले हिस्से में दाखिल होना पड़ता है।
जब मेघ ब्रजभूमि में मूसलाधार बारिश करने लगे, ऐसी बारिश देखकर सभी भयभीत हो गए और दौड़ कर श्री कृष्ण की शरण में पहुंचे। श्री कृष्णा ने सभी को गोवर्धन पर्वत की शरण में चलने को कहां। जब सब गोवर्धन पर्वत के निकट पहुंचे तब श्री कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्का उंगली पर उठा लिया। सभी बृजवासी भागकर गोवर्धन पर्वत के नीचे चले गए। ब्रज वासियों पर एक बूंद भी जल नहीं गिरा, यह चमत्कार देखकर इंद्रदेव को अपनी गलती का अहसास हुआ और वह श्री कृष्ण से क्षमा मांगने लगे। 7 दिन बाद श्री कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत नीचे रखा, इसके बाद ब्रजवासी हर वर्ष गोवर्धन पूजा करने लगे। तभी से आज तक गोवर्धन की पूजन हर घर हो रही है।
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