बाहरी छवि का धर्म व्यर्थ, मन और विचारों में शुद्धता आवश्यक-- मुनि प्रमाण सागर
- प्रक्षालन, शास्त्र भेंट और चित्र अनावरण के साथ हुआ धर्म सभा का शुभारंभ
घातक रिपोर्टर- जसवंत साहू सिलवानी
सिलवानी 12 दिसंबर।
अपने प्रवचन की शुरुआत में मुनि श्री ने धर्म के आंतरिक स्वरूप पर जोर देते हुए कहा कि धर्म करो लेकिन धर्म का कुल्ला मत करो। उन्होंने स्पष्ट किया कि धर्म का उद्देश्य केवल समाज को दिखाना या बाहरी क्रियाएँ करना नहीं, बल्कि आत्मा को पवित्र करना और जीवन को उत्कर्ष की ओर ले जाना है। मुनि श्री ने कहा कि यदि धर्म केवल बाहरी आडंबर बनकर रह जाए, और मन में अहंकारए नकारात्मकता या द्वेष भरा रहे, तो ऐसा धर्म केवल अभिनय मात्र है। सच्चा धर्म वह है जो व्यक्ति के भीतर परिवर्तन लाए।
मन में आध्यात्मिकता का स्पर्श आवश्यक---
मुनि प्रमाण सागर महाराज ने कहा कि आध्यात्मिकता का स्पर्श मन को निर्मल बनाता है और मनुष्य को सही दिशा प्रदान करता है। उन्होंने कहा पूजा, उपासना, और सत्संग का मूल उद्देश्य आत्मकल्याण है। इन क्रियाओं से तभी लाभ होगा जब उन्हें मन और श्रद्धा के साथ किया जाए। मुनि श्री ने धर्म के गूढ़ तत्व समझाते हुए बताया कि धर्मात्मा का धर्म केवल वचनों या उपदेशों में नहीं, बल्कि उसके विचार-आचार-व्यवहार में झलकता है। उन्होंने कहा कि धर्म को आत्मा में प्रतिष्ठित करो, तभी आत्मा धर्ममय बनेगी। उन्होंने कहा धर्म क्रिया नहीं, जीवन के रूपांतरण का प्रयोग है। उन्होंने समझाया कि पूजा, वंदना, नियम, संयम, ये सब तभी सार्थक हैं जब वे व्यक्ति के जीवन, मनोवृत्ति और व्यवहार में सकारात्मक परिवर्तन लाएँ



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