यूक्रेन युद्ध और भारत की नीति: नैतिकता बनाम राष्ट्रीय हित की कसौटी |
यूक्रेन युद्ध अब केवल दो देशों के बीच का सैन्य संघर्ष नहीं रह गया है। यह युद्ध वैश्विक शक्ति संतुलन, ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की दिशा तय करने वाला निर्णायक कारक बन चुका है। ऐसे समय में भारत की नीति बार-बार प्रश्नों के घेरे में लाई गई—कभी नैतिकता के नाम पर, तो कभी वैश्विक दबाव के औज़ार के रूप में। किंतु वस्तुतः भारत की नीति भावनात्मक नहीं, बल्कि यथार्थवादी और दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों पर आधारित रही है।
नैतिकता का वैश्विक दोहरापन
पश्चिमी शक्तियाँ यूक्रेन पर रूस के हमले को अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताती हैं, किंतु यही देश इराक, अफ़ग़ानिस्तान, लीबिया और सीरिया में सैन्य हस्तक्षेप के दौरान नैतिकता के मानदंड भूल चुके हैं। ऐसे में भारत के लिए किसी एक पक्ष की “नैतिक व्याख्या” को स्वीकार करना न तो तार्किक था और न ही ऐतिहासिक रूप से संगत। भारत ने युद्ध की निंदा किए बिना हिंसा के विरोध और संप्रभुता के सम्मान की बात कर संतुलन बनाए रखा।
रणनीतिक स्वायत्तता: भारत की कूटनीतिक रीढ़
संयुक्त राष्ट्र में भारत का मतदान से दूर रहना आलोचना का विषय बना, किंतु यह भारत की विदेश नीति की कमजोरी नहीं बल्कि उसकी ताकत का संकेत था। भारत ने स्पष्ट किया कि वह वैश्विक ध्रुवीकरण का हिस्सा नहीं बनेगा। रणनीतिक स्वायत्तता भारत को यह स्वतंत्रता देती है कि वह परिस्थितियों के अनुसार निर्णय ले, न कि किसी सैन्य या राजनीतिक गुट के दबाव में।
रूस से संबंध: मजबूरी नहीं, रणनीति
भारत-रूस संबंधों को केवल रक्षा आपूर्ति तक सीमित कर देखना एक सतही दृष्टिकोण है। रूस भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा, बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था और संयुक्त राष्ट्र सुधार जैसे मुद्दों पर एक महत्वपूर्ण साझेदार रहा है। युद्ध के दौरान सस्ते रूसी कच्चे तेल की खरीद को “अनैतिक” बताना उन देशों की दोहरी सोच को उजागर करता है, जो स्वयं आज भी रूस से गैस और उर्वरक खरीद रहे हैं।
मानवीय पक्ष और भारत की भूमिका
भारत ने युद्ध को मानवीय दृष्टि से देखने का प्रयास किया। ऑपरेशन गंगा के तहत भारतीय नागरिकों की सुरक्षित वापसी, यूक्रेन को मानवीय सहायता और युद्धविराम की अपील—ये सभी कदम भारत की जिम्मेदार वैश्विक भूमिका को रेखांकित करते हैं। प्रधानमंत्री का यह कथन कि “यह युद्ध का युग नहीं है”, केवल एक कूटनीतिक बयान नहीं, बल्कि भारत की सभ्यतागत सोच का प्रतिबिंब है।
पश्चिमी अपेक्षाएँ और भारतीय यथार्थ
अमेरिका और यूरोप भारत को अपने रणनीतिक ढाँचे में देखना चाहते हैं, लेकिन भारत सहयोगी है, अनुयायी नहीं। क्वाड, इंडो-पैसिफिक और रक्षा साझेदारियाँ भारत की प्राथमिकताएँ हैं, किंतु ये भारत की स्वतंत्र विदेश नीति की कीमत पर नहीं हो सकतीं। भारत का यह स्पष्ट रुख भविष्य में उसकी विश्वसनीयता को और मजबूत करता है।
निष्कर्ष: तटस्थता नहीं, परिपक्वता
यूक्रेन युद्ध में भारत की नीति को तटस्थता कहना एक सरलीकरण होगा। यह नीति दरअसल परिपक्व कूटनीति, रणनीतिक विवेक और राष्ट्रीय हितों की रक्षा का उदाहरण है। भारत ने यह संकेत दे दिया है कि उभरती वैश्विक व्यवस्था में वह न तो नैतिक उपदेशों से संचालित होगा और न ही दबाव की राजनीति से। यही दृष्टिकोण भारत को एक संतुलनकारी वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करता है।



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