एप्स्टीन फाइल्स और भारतीय राजनीति: साज़िश, अफ़वाह या सच की आहट?
जेफ़री एप्स्टीन—एक ऐसा नाम जिसने वैश्विक राजनीति, कॉरपोरेट जगत और सत्ता के गलियारों में भूचाल ला दिया। अमेरिका में नाबालिगों के यौन शोषण और मानव तस्करी के आरोपों में फँसे एप्स्टीन की मौत के बाद सामने आई तथाकथित “एप्स्टीन फाइल्स” ने दुनिया भर के प्रभावशाली व्यक्तियों पर सवाल खड़े कर दिए। लेकिन बड़ा प्रश्न यह है कि क्या इन फाइल्स का कोई सीधा या परोक्ष संबंध भारतीय राजनीति से भी है?
एप्स्टीन फाइल्स क्या हैं?
एप्स्टीन फाइल्स मूलतः वे दस्तावेज़, कोर्ट रिकॉर्ड, उड़ान लॉग्स, गवाहियों और संपर्क सूचियाँ हैं, जिनमें दुनिया के कई बड़े राजनेताओं, उद्योगपतियों और रसूख़दार हस्तियों के नाम सामने आए। इनमें से कई नामों पर आरोप साबित नहीं हुए, लेकिन सवालों की परछाईं ज़रूर पड़ी।
भारतीय राजनीति: नाम क्यों नहीं, सवाल क्यों?
अब तक सार्वजनिक रूप से जारी दस्तावेज़ों में किसी प्रमुख भारतीय राजनेता का नाम सीधे तौर पर प्रमाणित रूप से शामिल नहीं है। न ही किसी भारतीय जांच एजेंसी ने एप्स्टीन नेटवर्क से जुड़ा कोई आधिकारिक मामला दर्ज किया है। इसके बावजूद सोशल मीडिया और कुछ वैकल्पिक मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर यह नैरेटिव लगातार उछलता रहा है कि—
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क्या भारत के बड़े कारोबारी या राजनीतिक रसूख़ वाले लोग अंतरराष्ट्रीय “एलीट नेटवर्क” से जुड़े थे?
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क्या वैश्विक पावर सर्कल्स में भारत के प्रभावशाली लोगों की मौजूदगी पर जानबूझकर पर्दा डाला गया?
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क्या एप्स्टीन केस में चुनिंदा देशों और व्यक्तियों को ही निशाना बनाया गया?
अंतरराष्ट्रीय राजनीति और भारत का संदर्भ
भारत, एक उभरती वैश्विक शक्ति होने के नाते, अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ गहरे रणनीतिक संबंध रखता है। ऐसे में यह तर्क भी दिया जाता है कि यदि कोई संवेदनशील जानकारी होती, तो वह कूटनीतिक कारणों से सार्वजनिक न की गई हो या भारत, एक उभरती वैश्विक शक्ति होने के नाते उसको कमजोर करने के लिए एसा किया गया हो। हालाँकि यह सभी अनुमान है, तथ्य नहीं।
मीडिया की भूमिका: जाँच या सनसनी?
भारतीय मुख्यधारा मीडिया ने एप्स्टीन फाइल्स को लेकर सीमित कवरेज दी। आलोचकों का कहना है कि—
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अंतरराष्ट्रीय मामलों में भारत का मीडिया अक्सर “सुरक्षित दूरी” बनाए रखता है।
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बिना ठोस प्रमाण के नाम उछालना कानूनी जोखिम पैदा करता है।
वहीं समर्थकों का तर्क है कि सबूत के बिना चुप्पी ज़िम्मेदारी है, न कि मिलीभगत।
निष्कर्ष: सवाल ज़िंदा हैं, लेकिन सबूत नहीं
एप्स्टीन फाइल्स ने यह ज़रूर साबित किया कि सत्ता, पैसा और अपराध का गठजोड़ वैश्विक है। लेकिन जहाँ तक भारतीय राजनीति का सवाल है, अभी तक कोई ठोस, सत्यापित और न्यायिक रूप से स्वीकार्य प्रमाण सामने नहीं आया है।
फिर भी, एक लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध नहीं—
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यदि भविष्य में कोई विश्वसनीय दस्तावेज़ सामने आता है, तो उसकी निष्पक्ष जाँच ज़रूरी होगी।
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दोष सिद्ध होने तक किसी को अपराधी ठहराना, बोलना ठीक नहीं हैं और न ही न्याय।
सच अक्सर शोर में दबा रहता है—और एप्स्टीन फाइल्स की कहानी अभी पूरी नहीं हुई है।
संपादक - अरविन्द सिंह जादौन



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