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Friday, June 12, 2026
सम्पादकीय:- चींटियों का साम्राज्य और दुनिया का बोझ
यह कथा उन लोगों के लिए एक संदेश है जो किसी पद, प्रभाव या प्रसिद्धि के कारण स्वयं को समाज का एकमात्र आधार समझने लगते हैं। विशेष रूप से कुछ पत्रकार, नेता, अधिकारी या प्रभावशाली व्यक्ति कभी-कभी यह मान बैठते हैं कि उनके बिना सत्य, समाज या व्यवस्था का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। जबकि सच्चाई यह है कि व्यक्ति आते हैं और चले जाते हैं, लेकिन समाज और व्यवस्था निरंतर आगे बढ़ते रहते हैं।
एक बिल में कुछ चींटियाँ रहती थीं। उनका रोज़ का काम था बाहर निकलना, इधर-उधर से कुछ दाने, कीड़े-मकोड़े और भोजन का सामान जुटाकर वापस अपने बिल में ले आना। यह उनका स्वाभाविक और आवश्यक कार्य था। लेकिन धीरे-धीरे मेहनत से अधिक उन्हें अपने महत्व का नशा चढ़ने लगा।
समय बीता और चींटियों ने अपने ही बनाए भ्रमलोक में रहना शुरू कर दिया। अब उन्हें लगने लगा कि पृथ्वी उनके कंधों पर टिकी हुई है। सूरज उनके कारण उगता है, मौसम उनके कारण बदलते हैं और दुनिया का पूरा तंत्र उनकी मेहनत से ही संचालित हो रहा है। बिल के भीतर बैठकर वे स्वयं को विश्व व्यवस्था का केंद्र घोषित कर चुकी थीं।
उनकी बैठकों में आत्मप्रशंसा के प्रस्ताव पारित होते, एक-दूसरे की पीठ थपथपाई जाती और यह घोषणा की जाती कि यदि चींटियाँ एक दिन भी काम बंद कर दें तो पूरी पृथ्वी ठहर जाएगी। दुर्भाग्य यह था कि यह घोषणा सुनने वाला उनके अलावा कोई नहीं था।
वास्तविकता यह थी कि पृथ्वी को उनके अस्तित्व का शायद ही कोई आभास था। नदियाँ उनके बिना भी बह रही थीं, ऋतुएँ उनके बिना भी बदल रही थीं और दुनिया उनके बिना भी चल रही थी। लेकिन अहंकार का सबसे बड़ा गुण यही है कि वह व्यक्ति को उसकी वास्तविक हैसियत दिखाई नहीं देने देता।
समाज में भी ऐसे अनेक "चींटी साम्राज्य" दिखाई देते हैं। कुछ लोग सीमित दायरे में थोड़ी-सी गतिविधि करके स्वयं को व्यवस्था का निर्माता, नियंत्रक और संरक्षक समझ बैठते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि किसी भी व्यवस्था का निर्माण सामूहिक प्रयासों से होता है, किसी एक व्यक्ति या समूह की घोषणाओं से नहीं।
विडंबना यह है कि जितना छोटा दायरा होता है, उतना ही बड़ा दावा किया जाता है। कुछ लोग अपने आसपास कुछ लोगों की भीड़ देखकर स्वयं को इतिहास का निर्माता मान बैठते हैं, जबकि समय का पहिया उनकी उपस्थिति और अनुपस्थिति दोनों में समान गति से चलता रहता है।
चींटियों की कहानी हमें याद दिलाती है कि योगदान और अहंकार में बहुत अंतर होता है। योगदान समाज को आगे बढ़ाता है, जबकि अहंकार व्यक्ति को वास्तविकता से दूर ले जाता है। जो स्वयं को संसार का आधार समझने लगता है, वह अक्सर अपने ही भ्रम का शिकार बन जाता है।
अंततः सत्य यही है कि पृथ्वी किसी एक व्यक्ति, समूह या बिल के सहारे नहीं चलती। दुनिया पहले भी चल रही थी, आज भी चल रही है और आगे भी चलती रहेगी। बदलने वाली केवल वे चींटियाँ हैं, जो समय-समय पर अपने बिलों में बैठकर स्वयं को दुनिया का मालिक घोषित करती रहती हैं।
संपादकीय संदेश:
"जब अस्तित्व से बड़ा अहंकार हो जाए, तब व्यक्ति को लगता है कि दुनिया उसके सहारे चल रही है। जबकि सच्चाई यह होती है कि दुनिया को उसके भ्रम की खबर तक नहीं होती।"
संपादक- घातक रिपोर्टर समाचार पत्र
अरविन्द सिंह जादौन
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